कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था भगवान शिव ने, सच जानकर रह जायेंगे अचम्भित

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आज हम आपको बताने जा रहे हैं शास्त्रों के एक अद्भुत सत्य के बारे में जिसके पर में शायद आप विश्वास ना करें किंतु यह बात एकदम सत्य है। जिसका उल्लेख हमें आज भी शास्त्रों में मिलता है कि कृष्ण के प्रिय मित्र सुदामा का वध भगवान शिव ने ही किया था। आज हम आपको इस पोस्ट में बताएंगे कि भगवान शिव ने सुदामा का वध क्यों और कैसे किया था। सुदामा का पुनर्जन्म रहस्य: सुदामा की मृत्यु के पश्चात जब सुदामा को स्वर्ग लोक में रहने का स्थान प्राप्त हुआ था तब स्वर्ग लोक में सुदामा और विराजा दोनों निवास करते थे। सुदामा विराजा से अद्भुत प्रेम करते थे किंतु यह विराजा भगवान श्री कृष्ण से प्रेम करती थी जब श्री कृष्ण और विराजा अपने प्रेम में लीन थे। तो उस समय राधा जी वहां पर प्रकट हो गई थी तथा उन्होंने विराजा को ऐसा देख कर के पृथ्वी लोक पर निवास करने का श्राप दे दिया था।उसी प्रकार किसी कारणवश राधा ने सुदामा को भी श्राप देकर के प्रथ्वीलोक पर भेज दिया था। सुदामा और विराजा का पुनर्जन्म: जब सुदामा और विराजा को श्राप के कारण पृथ्वी पर आना पड़ा तो सुदामा का जन्म एक शंखचूर्ण नामक राक्षस के रूप में ह...

जानिए कैसे यह राजा स्वर्ग का इंद्र बना और कैसे उसका स्वर्ग से पतन हो गया


पुराणों के अनुसार चन्द्र वंश में एक प्रसिद्ध राजा हुआ जिसका नाम नहुष था. जो बहुत बड़ा धर्मात्मा था परंतु दोस्तों सत्ता का मद एक ऐसी चीज है जिसकी वजह से बड़े बड़े धर्मात्मा भी अधर्म के मार्ग पर चलने लगते है. ऐसा ही हुआ था राजा नहुष के साथ.

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जब इंद्र के द्वारा विश्वकर्मा के पुत्र वृत्रासुर का वध हुआ तो इंद्र को ब्रह्महत्या का पाप लग गया और वह उस पाप का प्रायश्चित करने के लिए एक हजार वर्ष के लिए तपस्या करने के लिए चला गया. उस समय स्वर्ग का इन्द्रासन बिना राजा के खाली पड़ा हुआ था. इसलिए सब देवतों ने ब्रह्मर्षियों के साथ परामर्श करके राजा नहुष को स्वर्ग का राजा बना दिया.

स्वर्ग का राज्य प्राप्त होने के कारण उसमे अहंकार उत्पन्न हो गया. वह इन्द्रासन के साथ साथ इंद्र की पत्नी शची पर भी अपना अधिकार समझने लगा. शची एक महान पतिव्रता स्त्री थी. उसपर बुरी नियत का उसे दंड तो मिलना ही था.

शची ने अपने पतिव्रत धर्म की रक्षा के लिए नहुष से यह कहलवाया कि वह नहुष से सिर्फ एक शर्त पर मिलने को तैयार है अगर वह ब्रह्मर्षियों द्वारा ढोयी हुई पालकी में बैठ कर उससे मिलने के लिए आये. नहुष ने शची की बात मान ली और ब्रह्मर्षियों द्वारा अपनी पालकी खिंचवाने लगा.

उन ब्रह्मर्षियों में दुर्वासा ऋषि भी शामिल थे. वह बहुत धीरे धीरे चल रहे थे. इस बात से क्रोधित होकर नहुष ने उनसे कहा क्यों सर्प की भांति धीरे धीरे चल रहे हो. इतना कहकर नहुष ने दुर्वासा ऋषि को लात मारी. दुर्वासा ऋषि शिवजी के अवतार है और उन्हें लात मारने से नहुष का बचा हुआ पूण्य कर्म भी नष्ट हो गया और वह श्रीहीन हो गया.

दुर्वासा ऋषि तो पहले से ही उनके क्रोधी स्वभाव के लिए जाने जाते थे. उन्होंने नहुष को सर्प बनकर पृथ्वी पर गिर जाने का श्राप दे दिया और उनके श्राप देते ही तुरंत नहुष सर्प बनकर स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर गया. इस तरह नहुष का स्वर्ग से पतन हो गया.

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