कृष्ण के मित्र सुदामा का वध क्यों किया था भगवान शिव ने, सच जानकर रह जायेंगे अचम्भित

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आज हम आपको बताने जा रहे हैं शास्त्रों के एक अद्भुत सत्य के बारे में जिसके पर में शायद आप विश्वास ना करें किंतु यह बात एकदम सत्य है। जिसका उल्लेख हमें आज भी शास्त्रों में मिलता है कि कृष्ण के प्रिय मित्र सुदामा का वध भगवान शिव ने ही किया था। आज हम आपको इस पोस्ट में बताएंगे कि भगवान शिव ने सुदामा का वध क्यों और कैसे किया था। सुदामा का पुनर्जन्म रहस्य: सुदामा की मृत्यु के पश्चात जब सुदामा को स्वर्ग लोक में रहने का स्थान प्राप्त हुआ था तब स्वर्ग लोक में सुदामा और विराजा दोनों निवास करते थे। सुदामा विराजा से अद्भुत प्रेम करते थे किंतु यह विराजा भगवान श्री कृष्ण से प्रेम करती थी जब श्री कृष्ण और विराजा अपने प्रेम में लीन थे। तो उस समय राधा जी वहां पर प्रकट हो गई थी तथा उन्होंने विराजा को ऐसा देख कर के पृथ्वी लोक पर निवास करने का श्राप दे दिया था।उसी प्रकार किसी कारणवश राधा ने सुदामा को भी श्राप देकर के प्रथ्वीलोक पर भेज दिया था। सुदामा और विराजा का पुनर्जन्म: जब सुदामा और विराजा को श्राप के कारण पृथ्वी पर आना पड़ा तो सुदामा का जन्म एक शंखचूर्ण नामक राक्षस के रूप में ह...

माता सीता का दिया श्राप आज भी सहना पड़ रहा है इनको, जानकार हो जाओगे हैरान


माता सीता का दिया हुआ श्राप इन्हें आज भी भुगना पड़ रहा है। दुनिया में ऐसी कई सारे श्राप हैं, जिसका प्रभाव आज भी देखने को मिलता है। इनमें ऐसा एक श्राप रामायण में माता सीता द्वारा दिए गए श्राप की सजा आज भी इन चारो को भुगतनी पड़ रही है।

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इस श्राप के अनुसार जब राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात वनवास से लौटकर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण एवं माता सीता पितृपक्ष के दौरान राजा दशरथ का श्राद्ध करने के लिए फाल्गु नदी के किनारे गए थे, तब वहां पिंडदान के लिए कुछ सामग्री कम पड़ गई थी, जिसे लेने के लिए भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण नगर की ओर लौट आते हैं परंतु नगर मैं उन्हें काफी समय लग जाता है, जिससे पंडित माता सीता को कह रहा था कि पिंड दान का समय निकलता जा रहा है। माता सीता की चिंता बढ़ने लगी, तब माता सीता ने वहां मौजूद फाल्गु नदी, केतकी के फूल, गाय और पंडित को साक्षी मानकर स्वर्गीय राजा दशरथ के नाम पर पिंडदान दे दिया, क्योंकि भगवान श्रीराम एवम लक्ष्मण को नगर से आने में देर हो चुकी थी, इसलिए यह पिंडदान माता सीता ने अकेले ही कर दिया, क्योंकि पिंडदान का मुहूर्त निकल जाने के बाद पिंड दान का कोई महत्व ही नहीं रह जाता।

जब कुछ देर पश्चात भगवान श्रीराम एवम लक्ष्मण लौटे तब माता सीता ने कहा कि मैंने पिंडदान कर दिया है, जिससे भगवान श्रीराम क्रोधित हो उठते हैं। माता सीता ने वहां मौजूद फाल्गु नदी, केतकी के फूल, गाय और पंडित को गवाही देने को कहा, उन सभी ने भगवान श्रीराम के क्रोध से डरकर माता सीता को गलत ठहरा दिया और उन सबने कहा अभी श्राद्ध का कार्य पूरा नहीं हुआ है। इस पर माता सीता को अत्यधिक क्रोध आया और माता सीता ने राजा दशरथ जी का ध्यान करके उनसे गवाही देने की प्रार्थना की और राजा दशरथ स्वयं प्रकट होकर सत्य बताया, तब जाकर भगवान श्रीराम का क्रोध शांत हुआ।

उन सबको झूठ बोलने के लिए माता सीता ने श्राप दिया, जो इस प्रकार है- पंडित को श्राप दिया कि पंडितों को कितना भी दान मिले उनके लिए कम ही पड़ेगा। फाल्गु नदी को श्राप दिया कि तुम हमेशा सुखि ही रहोगी, तुम्हारे ऊपर कभी पानी का बहाव नहीं होगा। गाय को यह श्राप मिला कि तुम पूजनीय होने के बावजूद भी तुम्हें हर घर में लोगों का झूठा ही खाने को मिलेगा और कौवे को श्राप मिला कि उसके अकेले खाने पर कभी पेट नहीं भरेगा, वह सभी कौवे के साथ मिलकर ही खाना पड़ेगा और उसकी आकस्मिक मृत्यु होगी।

सीता माता का यह श्राप इन चारों को आज भी भुगतना पड़ रहा है, आज भी फाल्गु नदी हमेशा सुखी ही रहती है, चाहे उसमें कितना भी पानी क्यों ना आ जाए और कौवा अपना पेट भरने के लिए झुंड में खाना खाता है और उसकी आकस्मिक मौत ही होती है। पंडितों को कितना भी दान मिले पर उसके लिए कम ही होता है और गाय पूजनीय होकर भी हर घर का जूठा खाना खाती है। यह पोस्ट आपको कैसी लगी, कृपया कमेंट करके अवश्य बताएं। मुझे फॉलो करना ना भूलें, कमेंट करके पोस्ट के बारे में अपनी राय जरुर दें। जय श्रीराम।

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