जैसा कि हम सब जानते हैं कि महाभारत काल में जब कौरवों द्वारा द्रोपदी का चीरहरण हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण ने आकर वहां द्रोपदी की लाज बचाई थी, परन्तु उस सभा में एक ऐसा महाबली भी मौजूद था, जिसने पूरी सभा के खिलाफ द्रोपदी के चीरहरण को रोकने के लिए आवाज उठाई थी। वह कोई और नहीं कौरव पुत्र ही था, आइए जानते हैं उस एकमात्र कौरव के बारे में जो अधर्म के नहीं धर्म के पक्ष में था।
महाभारत काल में पांडवों की चौपड़ में हार के बाद दुर्योधन ने जब दुशासन को द्रोपदी को खुले केशो में घसीट कर दरबार में लाने और निर्वस्त्र करके उसकी जांघ पर बैठाने का हुक्म दिया, तब सारी सभा चुप थी, दुशासन जब द्रोपदी को लेने चला, तब भी सारी सभा चुप थी, हालांकि सभा में भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य व गुरु कृपाचार्य जैसे बुजुर्ग महारथी मौजूद थे, इसके साथ ही स्वय पांडव व महारथी दानवीर कर्ण भी मौजूद थे, परंतु उनमें से किसी ने भी दुशासन को रोकने के लिए आवाज नहीं उठाई।
वह एकमात्र कौरव था, जिसका नाम था विकर्ण। जिसने भरी सभा में अपनी भाभी पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। विकर्ण ने तो खेल में पांडवों को स्वयं और अपनी पत्नी को दांव के रूप में लगाने पर भी सवाल उठाए थे, परंतु इसके बावजूद भी वहां मौजूद किसी भी महारथी का खून नहीं खोला था, उल्टे दानवीर महारथी कर्ण ने विकर्ण को भला- बुरा कहा और यह कहते हुए समझा कर बैठाने की चेष्टा की कि जब बड़े यहा बैठे हैं तो तुम छोटे होकर यहां क्यों कूद रहे हो। इस पर विकर्ण ने उसे करारा जवाब देते हुए कहा कि अगर कुरुवंश में सब बुजुर्गों के सामने उनकी बहू का अपमान हो रहा हो और कोई कुछ नहीं बोल रहा हो तो यह सभी सबसे बड़े अपराधी हैं, लेकिन उसकी बात सबने अनसुनी कर दी और उसके बाद जो कुछ हुआ, उस युग में नहीं होना चाहिए था। वह तो भगवान श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने द्रोपदी की लाज बचाई।
विकर्ण के बारे में महाभारत में ऐसा बताया जाता है कि विकर्ण ने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और गुरु कृपाचार्य से शिक्षा ली थी, वह एकमात्र कौरवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था। उसका पात्र महाभारत में वैसा ही था जैसा कि रामायण में कुंभकरण का था, जो कि अपने भाई को लाख समझाया था पर वह नहीं मानता, इसी तरह विकर्ण ने भी अपने भाई दुर्योधन को कई बार समझाया परंतु वह नहीं माना, अंत में विकर्ण ने भी कुंभकरण के भाती अपने भाई प्रेम में हंसते-हंसते जान दे दी।
विकर्ण की मृत्यु भी बड़ी वीरतापूर्वक हुई थी, महाभारत के युद्ध में जब कौरवों ने निहत्थे अभिमन्यु का वध किया था, तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि अगले दिन जयद्रथ को सूर्यास्त से पहले मार देगा अन्यथा स्वयं आत्मदाह कर लेगा, परंतु जब दोपहर हो गई और अर्जुन सफल नहीं हुआ तो महाबली भीम ने अर्जुन के लिए रास्ता बनाने के लिए कुरूरता पूर्वक कौरवों को मारना शुरू किया और र्जुन के लिए रास्ता बनाने लगा, तब दुर्योधन ने विकर्ण को अपने भाइयों की रक्षा करने का आदेश दिया। विकर्ण महाबली भीम के सामने खड़ा होकर, भीम को ललकारने लगा, इस पर भीम ने कहा तुमने चौपड़ में अपने भाइयों की करतूत देखी थी, तुम उसका पक्ष ना लो इस पर विकर्ण ने कहा कि मैं जानता हूं कि मेरा पक्ष अधर्मी है पर मुझे अपना भ्राता धर्म भी निभाना है, तुम युद्ध करो। इस पर भीम और विकर्ण के मध्य भीषण युद्ध हुआ और विकर्ण महाबली भीम के हाथों बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। आपको इस पोस्ट में मेरे द्वारा दी गई जानकारी कैसी लगी, कृपया मुझे कमेंट करके अवश्य बताएं। मेरी पोस्ट को शेयर अवश्य करें, मुझे फॉलो करना ना भूलें, कमेंट अवश्य करें।
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